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यह समझें कि युवा दिमाग के लिए कोडिंग क्यों महत्वपूर्ण है

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प्रारम्भिक स्तर से ही कोडिंग का ज्ञान कैसे किसी बच्चे के विकास में तेजी लाता है?
दुनिया जिस गति से विकसित हो रही है वह कुछ वर्षों के बाद आज के उच्च-भुगतान वाली नौकरियों को अप्रासंगिक बना देगी। भारत जैसे देश में जहां की शिक्षा प्रणाली अभी भी पुराने प्रचलन जैसे कि नवाचार की कमी और अनावश्यक पाठ्यक्रम से जूझ रही है, में तकनीक और कंप्यूटर के प्रभुत्व वाले नौकरी बाजार के अनुरूप बच्चों को तैयार करने के लिए कोडिंग एक सुव्यवस्थित तरीका है। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही कोडिंग का ज्ञान दिया जाये, तो बच्चे शायद इस बात को समझेंगे कि जब वे तकनीक का उपयोग करते हैं तो क्या होता है, यह कोई जादू नहीं है, यह कुछ ऐसा है जिसे वे अपने दम पर बना सकते हैं। प्रारंभिक अवस्था में ही कोडिंग से जुड़ने वाले बच्चे इसके प्रति प्यार जता सकते हैं या जुनून भी पैदा कर सकते हैं और यह जान सकते हैं कि यही वो चीज है जो वे जीवन में करना चाहते हैं। कोडिंग कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का एक प्रारंभिक चरण है।

बच्चों के लिए कोडिंग एक सरल ड्रैग-एंड-ड्रॉप विजूअल प्रोग्रामिंग के साथ शुरू होती है, जहां वे प्रोग्राम बनाने के लिए ब्लॉक कनेक्ट करते हैं। यह आगे और अधिक पारंपरिक प्रोग्रामिंग भाषाओं जैसे कि पायथन में परिवर्तित हो जाता है।

समस्याओं को हल करने की क्षमता एक खास विशेषता है जो सामान्य जीवन में बहुत उपयोगी है और हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे समस्याओं को हल करने में सक्षम बनें। कोडिंग बहुत कम उम्र से ही बच्चों को अपने तरीके से किसी समस्या से बाहर निकलने का रास्ता बनाने करने में मदद करता है।

लेकिन ‘कोडिंग सिखने’का विचार कुछ माता-पिता के लिए एक भारी-भरकम कार्य के समान होता है, ऐसी परिस्थिति में, उन्हें अपने दिमाग को तरोताजा करने की जरूरत है। आइए एक नज़र डालते हैं कि कैसे कोडिंग उन विषयों से अलग नहीं है जो बच्चे स्कूल में सीखते हैं।

कम उम्र में ही कोडिंग क्यों सिखाना होना चाहिए?
डिजिटल तकनीक आज हर बच्चों के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। वे स्मार्टफोन, वीडियो गेम, वीडियो मनोरंजन आदि से घिरे हुए हैं। यह तकनीक सॉफ्टवेयर या कंप्यूटर प्रोग्राम से संचालित होता जिसे कोडिंग द्वारा आसान बनाया जाता है।

बच्चों को उनके आसपास काम करने वाले गैजेट के बारे में सिखाना उतनी ही सामान्य बात होनी चाहिए, जितना उन्हें प्रकाश संश्लेषण और इसके निहितार्थ के बारे में बताना। 21वीं सदी आराम से बैठने वाला युग नहीं है, बच्चों को उनकी उड़ान उड़ने दें और 10वीं कक्षा के बाद उन्हें अपना पसंदीदा विषय को चुनने दें। प्रारंभिक अवस्था में एक्सपोजर एक बच्चे की सोच को आगे बढ़ाएगा और उनमें दूसरे स्वभाव के रूप में कम्प्यूटेशनल रिजनिंग को विकसित करेगा। किसी बच्चे के भावी इच्छाओं को नई उड़ान देने की कोई उम्र नहीं होती है; वास्तव में, यदि माता-पिता ऐसा करने के लिए कोई रास्ता तलाशते हैं, तो उन्हें ऐसा करने का अधिकार करना चाहिए। यहां तक कि कई गैर-प्रोग्रामिंग नौकरियों हैं, जहां कंप्यूटर के उपयोग की आवश्यकता होती है, उनमें भी कई स्तरों पर कोडिंग ज्ञान की आवश्यकता होती है। कोडिंग को बच्चों के सामने कहानी कहने के एक तौर पर पेश किया जा सकता है जिसमें एक तार्किक शुरुआत, प्रगति और समापन होता है। प्रोग्रामिंग/कोडिंग का ज्ञान मस्तिष्क प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है और जिसका परिणाम जीवन के अन्य पहलुओं पर असर डालता है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, “मस्तिष्क की मूल वास्तुशिल्प एक सतत प्रक्रिया के माध्यम से निर्मित होती है जो जन्म से पहले शुरू होती है और वयस्कता तक बनी रहती है। शुरुआती अनुभव पढ़ाई, स्वास्थ्य तथा व्यवहार के सभी तरीकों के लिए एक मजबूत या नाजुक नींव की स्थापना कर उस वास्तुशिल्प की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। जीवन के शुरूआती कुछ वर्षों में, प्रत्येक सेकंड 1 मिलियन से अधिक नए तंत्रिका कनेक्शन बनते हैं। तेजी से प्रसार की इस अवधि के बाद, प्रूनिंग नामक एक प्रक्रिया के माध्यम से कनेक्शन कम हो जाते हैं, जिससे मस्तिष्क सर्किट अधिक प्रभावी हो जाते हैं। मूलभूत दृष्टि और श्रवण के लिए उन जैसे संवेदी मार्ग सबसे पहले विकसित होते हैं, इसके बाद प्रारंभिक भाषा कौशल और उच्च संज्ञानात्मक कार्य होते हैं। कनेक्शन एक निर्धारित क्रम में आगे और पीछे होते हैं, बाद में, पहले वाले सरल सर्किट अधिक जटिल मस्तिष्क सर्किट बन जाते हैं।

इसका मतलब है कि वयस्क होने के बाद इसके सर्किटरी के कुछ हिस्सों की तुलना में शुरूआती स्तर पर ही किसी बच्चे के विकासशील मस्तिष्क वास्तुशिल्प को प्रशिक्षित करना कहीं बेहतर है। प्राथमिक स्तर पर, कोडिंग का ज्ञान बच्चों को सुस्पष्ट बनने और तार्किक रूप से सोचने में मदद करता है। वे अपने आस-पास हो रही चीजों को समझना शुरू कर देते हैं और यह अनुमान भी लगाने लगते हैं कि किस तर्क का उपयोग करने पर क्या होगा।

हालाँकि, देश भर के स्कूल आज की ‘तकनीकी वास्तविकता’के प्रति जागरूक हो चुके हैं और वे बुनियादी कंप्यूटर कौशल तथा ज्ञान प्रदान करने लगे हैं, इसके बावजूद जब पेशेवर भाषाओं और उपकरणों के साथ वास्तविक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की बात आती है, तो वे पिछड़ जाते हैं। इसके अलावा, बच्चों को इंटरमीडिएट और एडवांस प्रोजेक्ट्स में आगे बढ़ने के लिए किसी मार्गदर्शक के सहयोग की जरूरत पड़ती है।

कोडिंग से बच्चे क्या सीख सकते हैं?
जब बच्चे कोड पढ़ना और लिखना सीख जाते हैं, तो उनके संज्ञानात्मक कौशल तथा समस्या सुलझाने की क्षमता बढ़ जाती है। प्रारंभिक अवस्था में कोडिंग सीखने के कुछ फायदे नीचे दिये गये हैंः

1. कोडिंग बच्चों को सीमित संसाधनों के बीच उनके कल्पना को साकार करने और उसे बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती है। जब वे कोई काम की चीज बनाते हैं तो उनमें उपलब्धि हासिल करने की भावना बढ़ जाती है और उनका आत्मविश्वास चरम पर होता है।

2. कोडिंग बच्चों को अपनी परिकल्पना के माध्यम से जटिल परिस्थितियों को पार करना सिखाती है। अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए चरण-दर-चरण प्रक्रियाएं वही कार्यप्रणाली है, जिसके बारे में छात्रों को प्रशिक्षित किया जायेगा। कोडिंग की मदद से किसी बच्चे में प्रारंभिक चरण में ही समस्या को सुलझाने के गुण विकसित किये जाते हैं, आगे चलकर जिसका फायदा कई अन्य क्षेत्रों में भी मिलता है।

3. कई बार बच्चे जो चीज बनायेंगे, वे काम के नहीं होंगे। इसके बावजूद उनकी आत्मविश्वास तथा दृढ़ता बढ़ेगी, जिससे वे काम नहीं करने वाली चीजों के दोबारा बनने के बारे में सीखेंगे और उसे वे तब तक बनाते रहेंगे, जब तक कि वह काम करना शुरू न कर दे।

4. बच्चों का दिमाग रचनात्मक और चंचल होता है जो उन्हें गैरपारंपरिक तरीके से सोचने के लिए प्रेरित देता है। कोडिंग और समस्याओं को हल करने के असंख्य तरीके बच्चों को आगे बढ़ने में मदद करते हैं और निखरने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

5. कोडिंग गणित के कौशल को बढ़ाने में भी मदद करता है। यह बच्चों को गणित के व्यावहारिक अनुप्रयोग के बारे में बताता है और इसीलिए यह महत्वपूर्ण होता है। जब बच्चे यह सीखते हैं कि कोड कैसे करना है, तो वे अमूर्त अवधारणाओं की कल्पना करते हैं, जिससे वे विषयों को मजेदार और रचनात्मक बनाने के लिए वास्तविक-दुनिया की परिस्थितियों में गणित का उपयोग करने लगते हैं।

कोडिंग न केवल बच्चों के भविष्य की सम्भावनाओं को बढ़ाता है, बल्कि उन्हें अनुक्रमण, समस्यायों को सुलझाने, गणित की अवधारणाओं, पढ़ने तथा लिखने और रचनात्मकता आदि जैसे कौशल में प्रशिक्षित भी करता है, जो उनके समग्र शैक्षणिक प्रदर्शन को बेहतर बनाता है। बच्चे को कोडिंग का फायदा उसके जीवन के हर पहलू में मिलता है।

कैसे LEAD स्कूल अपने कोडिंग और प्रोग्रामिंग ज्ञान के साथ बच्चों के लिए एक अलग शैक्षणिक माहौल प्रदान करता है?

CCS post 02_02-03LEAD स्कूल का एकीकृत प्रणाली अपने छात्रों को कम उम्र से ही नेतृत्व क्षमता करने का अवसर देता है। “युवा सर्वश्रेष्ठ” के मंत्र का पालन करते हुए LEAD स्कूल बच्चों के भावनात्मक, सामाजिक, संज्ञानात्मक और भाषा विकास के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो बच्चों को स्कूल के बाहर भी सफलता के लिए तैयार करता है। LEAD स्कूल पेश करता है, भारत का पहला कम्प्यूटेशनल और कोडिंग कौशल (CCS), जो छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करता है। इसके अतिरिक्त LEAD स्कूल…

1. कंप्यूटर के स्थान पर कम्प्यूटेशनल और कोडिंग कौशल को एक विषय के तौर पर पढ़ाता है।
2. नवीनतम तकनीकों जैसे कि गेम डेवलपमेंट एंड डेटा साइंस ऑन पाइथन, ग्राफिक डिजाइनिंग ऑन स्क्रैच पर कोडिंग सिखाता है।
3. सुरक्षित और जिम्मेदार के साथ कंप्यूटर का उपयोग करना सिखाता है।
4. उपयोग करने, सोचने, तैयार करने की विविधतापूर्ण शैक्षणिक शैली प्रदान करता है, जो क्षमता और कौशल निर्माण में सर्वश्रेष्ठ होता है।
5. छात्र उन परियोजनाओं पर काम करते हैं जहां वे सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन को तैयार और प्रस्तुत करते हैं।

इसके अलावा, LEAD स्कूल पूरे वर्ष शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करता है जो पाठ्यक्रम के उच्च-गुणवत्तापूर्ण कार्यान्वयन को सुनिश्चित करता है। LEAD स्कूल के पाठ्यक्रम में मोबाइल पर कम्प्यूटेशन सीखाना भी शामिल है जिसका अभ्यास सभी लोग घर पर भी कर सकते हैं।

LEAD स्कूल में छात्र किसी प्रोजेक्ट पर काम करते हुए सीखते हैं, जहां हर साल वे 5-6 प्रोजेक्ट बनाते हैं जिसमें वेबसाइट, ई-बुक, सहपाठियों के बीच नोट साझा करना, टिक-टैक-टो गेम/साँप और सीढ़ी गेम आदि बनाना शामिल है। सीसीएस वर्ग के प्रोजैक्ट वास्तविक जीवन और अन्य विषयों से अवधारणाओं के साथ कंप्यूटर को एकीकृत करती हैं। उदाहरण के लिए, कक्षा 6 का कोई छात्र एक ऐसा दृश्यात्मक चित्र बनाता है जो पाइथागोरस प्रमेय आदि को साबित करता हो।

हमारे सफल CCS कार्यक्रम के बारे में आज ही किसी LEAD पेशेवर से बात करने के लिए: यहाँ क्लिक करें

About the author

Manasa is a Branding and Communication Manager at LEAD. She is an Asian College of Journalism alumnus and a former Teach for India Fellow. Manasa has also completed her MBA in marketing from Deakin University. She strongly believes that education has the power to shake the world and is excited to be a part of LEAD’s transformational journey.

Manasa Ramakrishnan

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